October 17th 2009

मिलता है

                      मिलता है

ताः१६/१०/२००९                     प्रदीप ब्रह्मभट्ट

सच्चे दीलसे काम करो, तुम्हे साथ मिलता है
मनसे भक्ति करते चलो, प्रभुका प्यार मिलता है
                                   ……..सच्चे दीलसे काम करो.
अवनीके बंधनसे जीवको,मुक्तिका द्वार मिलता है 
सच्चीराहपे चलके  दिलसे,संतोको सन्मान देना है
जगके बंधन छोडकेजीवको,मुक्तिका मार्ग लेना है
मिलतीहै राह सच्ची,ओर प्रभुका प्यार मिलता है
                                   ……..सच्चे दीलसे काम करो.
जिंदगीकी हर मोड पे,जब दीलसे महेनत मिलती है
पाता वो इन्सान सबकुछ,जो पैसोसे नहीं मिलता है
इन्सानियत जब दीलमें बसीहो,मंझील पास आती है
उज्वलजीवन होजाता तब,जीवनमे शांन्ती मिलती है
                               ……..सच्चे दीलसे काम करो
आनाजाना बंधन है कर्मोका, ना कोइ छुट पाया है
भक्तिभावका नाता है जगमें,ना उसमे कोइ बाधा है
प्रेम प्रभुसे दीलसेहोगा,जीवन जगमे पावन मिलता
आयेगी ना व्याधी कोइ,जहां प्यार जलासांइका होता
                                   ………सच्चे दीलसे काम करो.

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1 Comment »

  1. अच्छी कविता है.

    हालाकि गुजराती उच्चारण में बड़ी ई की मात्रा चलती है, फिर भी यदि हिन्दी के हिसाब से कुछ सुधार कर सकें तो बढ़िया रहेगा -

    मीलती – मिलती
    जीदगी – जिंदगी
    मीलता – मिलता
    दील – दिल

    Comment by रवि — October 17, 2009 @ 10:40 am

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